Tuesday, March 15, 2011
Monday, March 14, 2011
त्रिगुण रूप श्री दत्तात्रेय
श्री दत्तात्रेय या दत्त यानी ब्रह्मा-विष्णु-महेश का त्रिगुण रूप, जो राम-कृष्ण की तरह चिरंतन, चिरंजीव है, जो केवल दुष्टों का ही नाश नहीं करते, वरन अज्ञानरूपी अंधकार को भी दूर करते हैं, जिन्हें परब्रह्ममूर्ति सद्गुरु का अवतार माना गया है।
दत्तात्रेय में ईश्वर और गुरु दोनों रूप समाहित हैं। इसीलिए उन्हें 'श्री गुरुदेवदत्त' भी पुकारते हैं, जिनकी सेवा विभिन्न मार्गों से दत्त भक्तों द्वारा की जाती है, जिसमें गुरुचरित्र का पाठ भी शामिल है, जो मार्गशीर्ष शुद्ध 7 से मार्गशीर्ष 14, यानी दत्त जयंती तक पढ़ा जाता है।
इसके कुल 52 अध्याय में कुल 7491 पंक्तियाँ हैं। 'गुरुचरित्र' वेदतुल्य माना गया है। इसमें श्री पाद, श्री वल्लभ और श्री नरसिंह सरस्वती की अद्भुत लीलाओं व चमत्कारों का वर्णन है। इस ग्रंथ का वाचन चार तरह से किया जाता है। कुछ लोग प्रतिदिन निश्चित 51 या 100 पंक्तियाँ, तो कुछ केवल 5 पंक्तियाँ ही पढ़ते हैं।
कुछ लोग साल में केवल एक बार ही इसे एक दिन में या तीन दिन में पढ़ते हैं जबकि अधिकांश लोग दत्त जयंती पर मार्गशीर्ष शुद्ध 7 से मार्गशीर्ष 14 पर पढ़कर पूरा करते हैं। अधिकांश दत्त मंदिरों और दत्तभक्तों के यहाँ 'गुरुचरित्र' का श्रद्धा-भक्ति के साथ पाठ और इसी के साथ दत्त महामंत्र 'श्री दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा' का सामूहिक जप भी सुनाई देता है।
दत्तात्रेय में ईश्वर और गुरु दोनों रूप समाहित हैं। इसीलिए उन्हें 'श्री गुरुदेवदत्त' भी पुकारते हैं, जिनकी सेवा विभिन्न मार्गों से दत्त भक्तों द्वारा की जाती है, जिसमें गुरुचरित्र का पाठ भी शामिल है, जो मार्गशीर्ष शुद्ध 7 से मार्गशीर्ष 14, यानी दत्त जयंती तक पढ़ा जाता है।
इसके कुल 52 अध्याय में कुल 7491 पंक्तियाँ हैं। 'गुरुचरित्र' वेदतुल्य माना गया है। इसमें श्री पाद, श्री वल्लभ और श्री नरसिंह सरस्वती की अद्भुत लीलाओं व चमत्कारों का वर्णन है। इस ग्रंथ का वाचन चार तरह से किया जाता है। कुछ लोग प्रतिदिन निश्चित 51 या 100 पंक्तियाँ, तो कुछ केवल 5 पंक्तियाँ ही पढ़ते हैं।
कुछ लोग साल में केवल एक बार ही इसे एक दिन में या तीन दिन में पढ़ते हैं जबकि अधिकांश लोग दत्त जयंती पर मार्गशीर्ष शुद्ध 7 से मार्गशीर्ष 14 पर पढ़कर पूरा करते हैं। अधिकांश दत्त मंदिरों और दत्तभक्तों के यहाँ 'गुरुचरित्र' का श्रद्धा-भक्ति के साथ पाठ और इसी के साथ दत्त महामंत्र 'श्री दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा' का सामूहिक जप भी सुनाई देता है।
त्रिदेवों के शक्ति-पुंज हैं दत्तात्रेय
भगवान के प्रत्येक अवतार का एक विशिष्ट प्रयोजन होता है। श्रीदत्तात्रेयके अवतार में हमें असाधारण वैशिष्ट्य का दर्शन होता है। वे योगियों के परम ध्येय होने के कारण सर्वत्र गुरुदेव कहे जाते हैं। भगवान दत्तात्रेयका असाधारण कार्य है- अखण्ड रूप से ज्ञानदानकरते रहना। इस प्रकार ये गुरु के रूप में अपने भक्तों को अध्यात्म-ज्ञान का उपदेश देकर सांसारिक दुख से मुक्त करके उनकी अविद्या की निवृत्ति करते हैं। ये भक्त के हृदयाकाश में प्रकाशित होकर उसके अज्ञान-रूपी अंधकार को नष्ट कर देते हैं। स्वत:सिद्ध प्रकाश से अपने स्वरूप में विराजमान रहने से ये देव कहलाते हैं। सद्गुरुदेवदत्तात्रेयअवतार लेने से आज तक प्राणियों पर अनवरत उपकार एवं उनका उद्धार करते चले आ रहे हैं। उनके अवतार का प्रयोजन सृष्टि के अन्त तक विद्यमान रहेगा। मनुष्य का सबसे बडा शत्रु उसका अज्ञान ही है।
भगवान दत्तात्रेयके अवतार-चरित्र का अध्ययन करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि उनका आविर्भाव सृष्टि के प्रारंभिक सत्र में ही हो गया था। ब्रह्माजीके मानसपुत्र महर्षि अत्रि इनके पिता तथा कर्दम ऋषि की कन्या और सांख्यशास्त्रके प्रवक्ता कपिलदेव की बहिन सती अनुसूयाइनकी माता थीं। भगवान दत्तात्रेयका प्रादुर्भाव महर्षि अत्रि के चरम तप का पुण्यफलतथा सती अनुसूयाके परम पतिव्रता होने का सुफल है। प्राचीन ग्रंथों में ऐसी कथा पढने को मिलती है कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश जब परमसतीअनसूयाकी अत्यन्त कठोर परीक्षा लेने उनके आश्रम में पहुँचे तो माता अनुसूयाने उन्हें अपने सतीत्व के तेज से शिशु बना दिया। इसी कारण दत्तात्रेयको त्रिदेवोंकी समस्त शक्तियों से सम्पन्न माना जाता है।
श्रीमद्भागवत में महर्षि अत्रि एवं माता अनुसूयाके यहां त्रिदेवोंके अंश से तीन पुत्रों के जन्म लेने का उल्लेख मिलता है। इस पुराण के मत से ब्रह्माजीके अंश से चन्द्रमा, विष्णुजीके अंश से योगवेत्तादत्तात्रेयऔर महादेवजीके अंश से दुर्वासाऋषि अनुसूयामाता के गर्भ से उत्पन्न हुए। लेकिन वर्तमान युग में ब्रह्मा-विष्णु-महेशात्मक त्रिमुखीदत्तात्रेयकी उपासना ही प्रचलित है। इनके तीन मुख, छह हाथ वाला त्रिदेवमयस्वरूप ही सब जगह पूजा जा रहा है। दत्तमूर्तिके पीछे एक गाय तथा इनके आगे चार कुत्ते दिखाई देते हैं। औदुंबर वृक्ष के समीप इनका निवास बताया गया है। विभिन्न मठों, आश्रमों और मंदिरों में इनके इसी प्रकार के श्रीविग्रहोंका दर्शन होता है।
देवर्षिनारद नारदपुराणमें त्रिदेवात्मकभगवान दत्तात्रेयकी स्तुति में कहते हैं-
जगदुत्पत्तिकत्र्रेचस्थिति-संहारहेतवे।
भवपाश-विमुक्तायदत्तात्रेयनमोऽस्तुते॥
संसार के बंधन से सर्वथा मुक्त तथा संसार की उत्पत्ति, पालन और संहार के मूल कारण-स्वरूप भगवान दत्तात्रेयको मेरा नमस्कार है।
योगियों का ऐसा मानना है कि भगवान दत्तात्रेयप्रात:काल ब्रह्माजीके स्वरूप में, मध्याह्न के समय विष्णुजीके स्वरूप में तथा सायंकाल शंकरजीके स्वरूप में दर्शन देते हैं। तभी तो शास्त्रों में इनकी प्रशंसा में कहा गया है-
आदौ ब्रह्मा मध्येविष्णुरन्तेदेव: सदाशिव:।
मूर्तित्रय-स्वरूपायदत्तात्रेयनमोऽस्तुते॥
दिन के प्रारंभ में ब्रह्मा-रूप, मध्य में विष्णु-रूप और अन्त में सदाशिवरूप धारण करने वाले त्रिमूर्ति-स्वरूप भगवान दत्तात्रेयको नमस्कार है।
तन्त्रशास्त्रके मूल ग्रन्थ रुद्रयामल के हिमवत् खण्ड में शिव-पार्वती के संवाद के माध्यम से श्रीदत्तात्रेयके वज्रकवचका वर्णन उपलब्ध होता है। इसका पाठ करने से असाध्य कार्य भी सिद्ध हो जाते हैं तथा सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं। इस कवच का अनुष्ठान कभी भी निष्फल नहीं होता। इस कवच से यह रहस्योद्घाटनभी होता है कि भगवान दत्तात्रेयस्मर्तृगामीहैं। यह अपने भक्त के स्मरण करने पर तत्काल उसकी सहायता करते हैं। ऐसी मान्यता है कि ये नित्य प्रात:काशी में गंगाजीमें स्नान करते हैं। इसी कारण काशी के मणिकर्णिकाघाट की दत्तपादुकाइनके भक्तों के लिये पूजनीय स्थान है। वे पूर्ण जीवन्मुक्त हैं। इनकी आराधना से सब पापों का नाश हो जाता है। ये भोग और मोक्ष सब कुछ देने में समर्थ हैं।
प्राचीनकाल से ही सद्गुरु भगवान दत्तात्रेयने अनेक ऋषि-मुनियों तथा विभिन्न सम्प्रदायों के प्रवर्तक आचार्यो को सद्ज्ञान का उपदेश देकर कृतार्थ किया है। इन्होंने परशुरामजीको श्रीविद्या-मंत्र प्रदान किया था। त्रिपुरारहस्य में दत्त-भार्गव-संवाद के रूप में अध्यात्म के गूढ रहस्यों का उपदेश मिलता है। ऐसा भी कहा जाता है कि शिवपुत्रकार्तिकेय को दत्तात्रेयजीने अनेक विद्याएं प्रदान की थीं। भक्त प्रह्लाद को अनासक्ति-योग का उपदेश देकर उन्हें अच्छा राजा बनाने का श्रेय इनको ही जाता है। सांकृति-मुनिको अवधूत मार्ग इन्होंने ही दिखाया। कार्तवीर्यार्जुनको तन्त्रविद्याएवं नार्गार्जुनको रसायन विद्या इनकी कृपा से ही प्राप्त हुई थी। गुरु गोरखनाथ को आसन, प्राणायाम, मुद्रा और समाधि-चतुरंग योग का मार्ग भगवान दत्तात्रेयने ही बताया था। परम दयालु भक्तवत्सल भगवान दत्तात्रेयआज भी अपने शरणागत का मार्गदर्शन करते हैं और सारे संकट दूर करते हैं। मार्गशीर्ष-पूर्णिमा इनकी प्राकट्य तिथि होने से हमें अंधकार से प्रकाश में आने का सुअवसर प्रदान करती है।
भगवान दत्तात्रेयके अवतार-चरित्र का अध्ययन करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि उनका आविर्भाव सृष्टि के प्रारंभिक सत्र में ही हो गया था। ब्रह्माजीके मानसपुत्र महर्षि अत्रि इनके पिता तथा कर्दम ऋषि की कन्या और सांख्यशास्त्रके प्रवक्ता कपिलदेव की बहिन सती अनुसूयाइनकी माता थीं। भगवान दत्तात्रेयका प्रादुर्भाव महर्षि अत्रि के चरम तप का पुण्यफलतथा सती अनुसूयाके परम पतिव्रता होने का सुफल है। प्राचीन ग्रंथों में ऐसी कथा पढने को मिलती है कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश जब परमसतीअनसूयाकी अत्यन्त कठोर परीक्षा लेने उनके आश्रम में पहुँचे तो माता अनुसूयाने उन्हें अपने सतीत्व के तेज से शिशु बना दिया। इसी कारण दत्तात्रेयको त्रिदेवोंकी समस्त शक्तियों से सम्पन्न माना जाता है।
श्रीमद्भागवत में महर्षि अत्रि एवं माता अनुसूयाके यहां त्रिदेवोंके अंश से तीन पुत्रों के जन्म लेने का उल्लेख मिलता है। इस पुराण के मत से ब्रह्माजीके अंश से चन्द्रमा, विष्णुजीके अंश से योगवेत्तादत्तात्रेयऔर महादेवजीके अंश से दुर्वासाऋषि अनुसूयामाता के गर्भ से उत्पन्न हुए। लेकिन वर्तमान युग में ब्रह्मा-विष्णु-महेशात्मक त्रिमुखीदत्तात्रेयकी उपासना ही प्रचलित है। इनके तीन मुख, छह हाथ वाला त्रिदेवमयस्वरूप ही सब जगह पूजा जा रहा है। दत्तमूर्तिके पीछे एक गाय तथा इनके आगे चार कुत्ते दिखाई देते हैं। औदुंबर वृक्ष के समीप इनका निवास बताया गया है। विभिन्न मठों, आश्रमों और मंदिरों में इनके इसी प्रकार के श्रीविग्रहोंका दर्शन होता है।
देवर्षिनारद नारदपुराणमें त्रिदेवात्मकभगवान दत्तात्रेयकी स्तुति में कहते हैं-
जगदुत्पत्तिकत्र्रेचस्थिति-संहारहेतवे।
भवपाश-विमुक्तायदत्तात्रेयनमोऽस्तुते॥
संसार के बंधन से सर्वथा मुक्त तथा संसार की उत्पत्ति, पालन और संहार के मूल कारण-स्वरूप भगवान दत्तात्रेयको मेरा नमस्कार है।
योगियों का ऐसा मानना है कि भगवान दत्तात्रेयप्रात:काल ब्रह्माजीके स्वरूप में, मध्याह्न के समय विष्णुजीके स्वरूप में तथा सायंकाल शंकरजीके स्वरूप में दर्शन देते हैं। तभी तो शास्त्रों में इनकी प्रशंसा में कहा गया है-
आदौ ब्रह्मा मध्येविष्णुरन्तेदेव: सदाशिव:।
मूर्तित्रय-स्वरूपायदत्तात्रेयनमोऽस्तुते॥
दिन के प्रारंभ में ब्रह्मा-रूप, मध्य में विष्णु-रूप और अन्त में सदाशिवरूप धारण करने वाले त्रिमूर्ति-स्वरूप भगवान दत्तात्रेयको नमस्कार है।
तन्त्रशास्त्रके मूल ग्रन्थ रुद्रयामल के हिमवत् खण्ड में शिव-पार्वती के संवाद के माध्यम से श्रीदत्तात्रेयके वज्रकवचका वर्णन उपलब्ध होता है। इसका पाठ करने से असाध्य कार्य भी सिद्ध हो जाते हैं तथा सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं। इस कवच का अनुष्ठान कभी भी निष्फल नहीं होता। इस कवच से यह रहस्योद्घाटनभी होता है कि भगवान दत्तात्रेयस्मर्तृगामीहैं। यह अपने भक्त के स्मरण करने पर तत्काल उसकी सहायता करते हैं। ऐसी मान्यता है कि ये नित्य प्रात:काशी में गंगाजीमें स्नान करते हैं। इसी कारण काशी के मणिकर्णिकाघाट की दत्तपादुकाइनके भक्तों के लिये पूजनीय स्थान है। वे पूर्ण जीवन्मुक्त हैं। इनकी आराधना से सब पापों का नाश हो जाता है। ये भोग और मोक्ष सब कुछ देने में समर्थ हैं।
प्राचीनकाल से ही सद्गुरु भगवान दत्तात्रेयने अनेक ऋषि-मुनियों तथा विभिन्न सम्प्रदायों के प्रवर्तक आचार्यो को सद्ज्ञान का उपदेश देकर कृतार्थ किया है। इन्होंने परशुरामजीको श्रीविद्या-मंत्र प्रदान किया था। त्रिपुरारहस्य में दत्त-भार्गव-संवाद के रूप में अध्यात्म के गूढ रहस्यों का उपदेश मिलता है। ऐसा भी कहा जाता है कि शिवपुत्रकार्तिकेय को दत्तात्रेयजीने अनेक विद्याएं प्रदान की थीं। भक्त प्रह्लाद को अनासक्ति-योग का उपदेश देकर उन्हें अच्छा राजा बनाने का श्रेय इनको ही जाता है। सांकृति-मुनिको अवधूत मार्ग इन्होंने ही दिखाया। कार्तवीर्यार्जुनको तन्त्रविद्याएवं नार्गार्जुनको रसायन विद्या इनकी कृपा से ही प्राप्त हुई थी। गुरु गोरखनाथ को आसन, प्राणायाम, मुद्रा और समाधि-चतुरंग योग का मार्ग भगवान दत्तात्रेयने ही बताया था। परम दयालु भक्तवत्सल भगवान दत्तात्रेयआज भी अपने शरणागत का मार्गदर्शन करते हैं और सारे संकट दूर करते हैं। मार्गशीर्ष-पूर्णिमा इनकी प्राकट्य तिथि होने से हमें अंधकार से प्रकाश में आने का सुअवसर प्रदान करती है।
त्रिगुण रूप श्री दत्तात्रेय
श्री दत्तात्रेय या दत्त यानी ब्रह्मा-विष्णु-महेश का त्रिगुण रूप, जो राम-कृष्ण की तरह चिरंतन, चिरंजीव है, जो केवल दुष्टों का ही नाश नहीं करते, वरन अज्ञानरूपी अंधकार को भी दूर करते हैं, जिन्हें परब्रह्ममूर्ति सद्गुरु का अवतार माना गया है।
दत्तात्रेय में ईश्वर और गुरु दोनों रूप समाहित हैं। इसीलिए उन्हें 'श्री गुरुदेवदत्त' भी पुकारते हैं, जिनकी सेवा विभिन्न मार्गों से दत्त भक्तों द्वारा की जाती है, जिसमें गुरुचरित्र का पाठ भी शामिल है, जो मार्गशीर्ष शुद्ध 7 से मार्गशीर्ष 14, यानी दत्त जयंती तक पढ़ा जाता है।
इसके कुल 52 अध्याय में कुल 7491 पंक्तियाँ हैं। 'गुरुचरित्र' वेदतुल्य माना गया है। इसमें श्री पाद, श्री वल्लभ और श्री नरसिंह सरस्वती की अद्भुत लीलाओं व चमत्कारों का वर्णन है। इस ग्रंथ का वाचन चार तरह से किया जाता है। कुछ लोग प्रतिदिन निश्चित 51 या 100 पंक्तियाँ, तो कुछ केवल 5 पंक्तियाँ ही पढ़ते हैं।
कुछ लोग साल में केवल एक बार ही इसे एक दिन में या तीन दिन में पढ़ते हैं जबकि अधिकांश लोग दत्त जयंती पर मार्गशीर्ष शुद्ध 7 से मार्गशीर्ष 14 पर पढ़कर पूरा करते हैं। अधिकांश दत्त मंदिरों और दत्तभक्तों के यहाँ 'गुरुचरित्र' का श्रद्धा-भक्ति के साथ पाठ और इसी के साथ दत्त महामंत्र 'श्री दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा' का सामूहिक जप भी सुनाई देता है।
दत्तात्रेय में ईश्वर और गुरु दोनों रूप समाहित हैं। इसीलिए उन्हें 'श्री गुरुदेवदत्त' भी पुकारते हैं, जिनकी सेवा विभिन्न मार्गों से दत्त भक्तों द्वारा की जाती है, जिसमें गुरुचरित्र का पाठ भी शामिल है, जो मार्गशीर्ष शुद्ध 7 से मार्गशीर्ष 14, यानी दत्त जयंती तक पढ़ा जाता है।
इसके कुल 52 अध्याय में कुल 7491 पंक्तियाँ हैं। 'गुरुचरित्र' वेदतुल्य माना गया है। इसमें श्री पाद, श्री वल्लभ और श्री नरसिंह सरस्वती की अद्भुत लीलाओं व चमत्कारों का वर्णन है। इस ग्रंथ का वाचन चार तरह से किया जाता है। कुछ लोग प्रतिदिन निश्चित 51 या 100 पंक्तियाँ, तो कुछ केवल 5 पंक्तियाँ ही पढ़ते हैं।
कुछ लोग साल में केवल एक बार ही इसे एक दिन में या तीन दिन में पढ़ते हैं जबकि अधिकांश लोग दत्त जयंती पर मार्गशीर्ष शुद्ध 7 से मार्गशीर्ष 14 पर पढ़कर पूरा करते हैं। अधिकांश दत्त मंदिरों और दत्तभक्तों के यहाँ 'गुरुचरित्र' का श्रद्धा-भक्ति के साथ पाठ और इसी के साथ दत्त महामंत्र 'श्री दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा' का सामूहिक जप भी सुनाई देता है।
साईं बाबा
एक सुनसान रास्ते पर
साईं बाबा चले जा रहे है
मै उनकी भक्त उनके पीछे चल रही हूँ
साईं बाबा तो आगे निकल गए
और मै पीछे ही रह गयी
फिर भी कोशिश कर रही हूँ
साईं बाबा बहुत दूर चले गए
और मै थक गयी
मेने आवाज़ दी
साईनाथ साईनाथ
बस मै थक गयी
साईं बाबा तो अदृश्य हो गए
अर्थात
साईनाथ को पाना आसान नहीं
उनके पीछे चलना आसान नहीं
उनकी राह तो बहूत लम्बी है
यह सच की राह है
उनकी भक्ति में ही शक्ति है
अरे मेरे भक्त
निकल पड मुसाफिर बन कर
उस राह पर
कही न कही कभी न कभी
किसी न किसी मोड पर
बाबा तेरा इंतज़ार कर रहे है
थाम लेगे तेरा हाथ
ले जाये गे तुझे उस पार
जहा प्यार का स्त्रोत बहता है
जहा मन शांत रहता है
जहा इन्द्रियों का कोई बस नहीं
लेकिन साईं पर विश्वास करना जरूरी है
उनका सिमरन करना जरूरी है
उनेह महसूस करना जरूरी है
रास्ता अपने आप ही बन जाएगा
यही है सची राह
Logged
--------------------------------------------------------------------------------
sabke dil me baste hi ushe sai sai kehte hai
jai sainath
साईं बाबा चले जा रहे है
मै उनकी भक्त उनके पीछे चल रही हूँ
साईं बाबा तो आगे निकल गए
और मै पीछे ही रह गयी
फिर भी कोशिश कर रही हूँ
साईं बाबा बहुत दूर चले गए
और मै थक गयी
मेने आवाज़ दी
साईनाथ साईनाथ
बस मै थक गयी
साईं बाबा तो अदृश्य हो गए
अर्थात
साईनाथ को पाना आसान नहीं
उनके पीछे चलना आसान नहीं
उनकी राह तो बहूत लम्बी है
यह सच की राह है
उनकी भक्ति में ही शक्ति है
अरे मेरे भक्त
निकल पड मुसाफिर बन कर
उस राह पर
कही न कही कभी न कभी
किसी न किसी मोड पर
बाबा तेरा इंतज़ार कर रहे है
थाम लेगे तेरा हाथ
ले जाये गे तुझे उस पार
जहा प्यार का स्त्रोत बहता है
जहा मन शांत रहता है
जहा इन्द्रियों का कोई बस नहीं
लेकिन साईं पर विश्वास करना जरूरी है
उनका सिमरन करना जरूरी है
उनेह महसूस करना जरूरी है
रास्ता अपने आप ही बन जाएगा
यही है सची राह
Logged
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sabke dil me baste hi ushe sai sai kehte hai
jai sainath
मनुष्य को कर्मों का कर्ज चुकाना होगा
भगवान ने हमारे जीवन को पवित्र बनाने के लिए समय-समय पर जो उपदेश दिए हैं, वे शास्त्रों के रूप में हमारे सामने हैं। हमें यह जो मनुष्य भव मिला है, यदि कर्मों का कर्ज चुका दिया तो सीधे मोक्ष प्राप्त हो सकता है। मनुष्य को अपने कर्मों का भुगतान स्वयं करना पड़ता है।
उपाध्याय प्रवर मूलमुनिजी ने समाजवादी इंदिरानगर स्थित जैन स्थानक पर ये प्रेरणास्पद उद्गार महती धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि कई भवों के बाद मनुष्य जन्म प्राप्त होता है। हम मनुष्य भव को सद्कार्यों में लगाकर जीवन का कल्याण कर सकते हैं।
ऋषभमुनिजी ने कहा कि भगवान के शरीर में तीर्थंकर का शरीर सबसे श्रेष्ठ बना है।
तीर्थंकरों के शरीर में सुगंध आती है जबकि भगवान के पास जाते ही समभाव आ जाता है। भगवान के 34 अतिशय का प्रभाव रहता है। भगवान का शरीर के प्रति राग नहीं रहता। केवलज्ञान ही पूर्ण ज्ञान रहता है। आत्मा ही गुरु है। आत्मा ही देव है।
उपाध्याय प्रवर मूलमुनिजी ने समाजवादी इंदिरानगर स्थित जैन स्थानक पर ये प्रेरणास्पद उद्गार महती धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि कई भवों के बाद मनुष्य जन्म प्राप्त होता है। हम मनुष्य भव को सद्कार्यों में लगाकर जीवन का कल्याण कर सकते हैं।
ऋषभमुनिजी ने कहा कि भगवान के शरीर में तीर्थंकर का शरीर सबसे श्रेष्ठ बना है।
तीर्थंकरों के शरीर में सुगंध आती है जबकि भगवान के पास जाते ही समभाव आ जाता है। भगवान के 34 अतिशय का प्रभाव रहता है। भगवान का शरीर के प्रति राग नहीं रहता। केवलज्ञान ही पूर्ण ज्ञान रहता है। आत्मा ही गुरु है। आत्मा ही देव है।
श्री हनुमान जी की आरती
श्री हनुमान जी की आरती
~~~~~~~~~~~~~~~
आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ॥ आरती……
जाके बल से गिरिवर काँपै। रोग-दोष जाके निकट न झाँपै ॥1॥
अंजनी पुत्र महा बलदाई। संतन के प्रभु सदा सहाई ॥2॥
दे बीरा रघुनाथ पठाए। लंका जारि सिया सुधि लाए ॥3॥
लंका सो कोट समुद्र सी खाई। जात पवनसुत बार न लाई ॥4॥
लंका जारि असुर संहारे। सियारामजी के काज सँवारे ॥5॥
लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे। आनि सजीवन प्रान उबारे ॥6॥
पैठि पाताल तोरि जम-कारे। अहिरावन की भुजा उखारे ॥7॥
बाएं भुजा असुर दल मारे। दहिने भुजा संतजन तारे ॥8॥
सुर नर मुनि आरती उतारें। जै जै जै हनुमान उचारें ॥9॥
कंचन थार कपूर लौ छाई। आरति करत अंजना माई ॥10॥
जो हनुमानजी की आरति गावै। बसि बैकुण्ठ परम पद पवै ॥11॥
~~~~~~~~~~~~~~~
आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ॥ आरती……
जाके बल से गिरिवर काँपै। रोग-दोष जाके निकट न झाँपै ॥1॥
अंजनी पुत्र महा बलदाई। संतन के प्रभु सदा सहाई ॥2॥
दे बीरा रघुनाथ पठाए। लंका जारि सिया सुधि लाए ॥3॥
लंका सो कोट समुद्र सी खाई। जात पवनसुत बार न लाई ॥4॥
लंका जारि असुर संहारे। सियारामजी के काज सँवारे ॥5॥
लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे। आनि सजीवन प्रान उबारे ॥6॥
पैठि पाताल तोरि जम-कारे। अहिरावन की भुजा उखारे ॥7॥
बाएं भुजा असुर दल मारे। दहिने भुजा संतजन तारे ॥8॥
सुर नर मुनि आरती उतारें। जै जै जै हनुमान उचारें ॥9॥
कंचन थार कपूर लौ छाई। आरति करत अंजना माई ॥10॥
जो हनुमानजी की आरति गावै। बसि बैकुण्ठ परम पद पवै ॥11॥
हनुमान जी कौन हैं, कहाँ रहते हैं
हर मंगलवार और शनिवार को हिंदू जन हनुमान जी की पूजा करते हैं। ये हनुमान जी कौन हैं, कहाँ रहते हैं? हमारे शास्त्रों में जो वर्णन मिलता है उससे ऐसी छवि बनती है कि हनुमान एक ऐसे महावानर थे जिन्होंने रामायण काल में राम के साथ उनके महान कार्यों में सहयोग दिया और उनकी निष्काम भाव से सेवा की। बचपन से हम रामलीलाएँ देखते आ रहे हैं और हमने हनुमान को एक अवतार मान लिया जो कि आज केवल मंदिरों में, तीर्थस्थलों में, मूर्ति के रूप में ही सुशोभित व प्रासंगिक हैं।
अंधविश्वास व धार्मिक आस्था के बीच अत्यंत पतली रेखा होती है। राम चरित मानस में तुलसीदास ने जनसाधारण को समझाने के उद्देश्य से ही हनुमान का एक व्यक्ति के रूप में वर्णन किया है और उन्हें अपने गुरु का दर्जा दिया है।
हनु का अर्थ होता है ग्रीवा, चेहरे के नीचे वाला भाग अर्थात ठोड़ी, मान का अर्थ होता है गरिमा, बड़ाई, सम्मान। इस प्रकार हनुमान का मतलब ऐसा व्यक्ति जिसने अपने मान-सम्मान को अपनी ठोड़ी के नीचे रखा है अर्थात जीत लिया है। जिसने अपने मान-सम्मान को जीत लिया है, उसके प्रभाव से जो मुक्त हो चुका है, वही हनुमान हो सकता है। हनुमान का एक नाम बालाजी है, जिसका तात्पर्य है बालक। हमारे ग्रंथों में हनुमान जी को हमेशा बालक ही दिखलाया गया है। बालक के समान निष्कलुष हृदय वाला व्यक्ति ही सम्मान पाने की लालसा से मुक्त रह सकता है और सही अर्थों में ब्रह्माचर्य का पालन कर सकता है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार भी हनुमान जी ने कभी अपनी शक्ति व सामर्थ्य का गर्व नहीं किया। राम दरबार के चित्र में उन्होंने सबसे नीचे भूमि पर, सेवक वाली जगह पर ही हाथ जोड़े बैठे दिखाया जाता है।
ऐसे महान चरित्र को वानर के रूप में क्यों चित्रित किया गया? ऐसा प्रश्न आपके मन में भी जरूर उठता होगा। कहाँ ऐसा महान व्यक्तित्व और कहाँ वानर रूप, जो एक निकृष्ट व उद्दण्ड जानवर माना जाता है। वास्तव में वानर प्रतीक है मनुष्य के अविवेकी व चंचल मन का। हमारा मन वानर के समान ही कभी भी कहीं भी टिक कर नहीं बैठ सकता, अत्यंत ही चलायमान है। और मन का नियंत्रण अत्यंत ही दुष्कर कार्य है। हनुमान पवनपुत्र हैं अर्थात पवन से भी अधिक तेज गति से चलने वाले इस मन के वे पुत्र हैं। अब बताइए, एक तो वानर की उपमा व दूसरी पवन की- दोनों ही अत्यंत चंचल। उनको वानराधीश कहने का तात्पर्य यही है कि वे मन रूपी वानर के अधिपति हैं, स्वामी हैं। उनका अपनी चंचल इंद्रियों पर नियंत्रण है। केवल मन का स्वामी ही राम रूपी ईश्वर का सवोर्त्तम भक्त हो सकता है और धर्म के कार्यों में निष्काम भाव से भाग ले सकता है।
यहाँ राम का तात्पर्य है उस रमण करने वाले तत्व से जो कि हर जगह समान रूप से व्याप्त है। दशरथ नंदन राम तो उसे व्यक्त करने के प्रतीक मात्र हैं। याद रखें कि निष्कामता सभी महान गुणों की जननी है। हनुमान निष्काम गुण की प्रतिमूर्ति हैं, इसीलिए वे कहते हैं, 'रामकाज किए बिनु मोहि कहाँ विश्राम।' वे पूरी तरह समर्पित हैं राम के प्रति, बिना किसी प्रतिफल की आशा के। यही है निष्काम भक्ति की पराकाष्ठा।
हनुमान माता अंजना व पिता केसरी के पुत्र हैं, शास्त्रों में ऐसा ही वर्णित है। माता अंजना अर्थात आँख व पिता केसरी अर्थात सिंह के समान अभूतपूर्व साहस व अभय की भावना। मनुष्य में अच्छाई या बुराई आँख से ही प्रवेश करती है- आँखों का मतलब सिर्फ दैहिक आँखें नहीं, बल्कि मन की आँखें भी, हमारा नजरिया, दृष्टिकोण। हनुमान का जन्म विशुद्ध चिंतन व सिंह के समान अभय व्यक्तित्व द्वारा ही संभव है। डरा हुआ व्यक्ति अपनी बात पर अडिग नहीं रह सकता और भय वश कुछ भी कर सकता है। हनुमान अपने जीवनकाल में न किसी से डरे न ही अभिमान किया। इसलिए वे न कभी पराजित हुए और न ही उनकी मृत्यु हुई।
अंधविश्वास व धार्मिक आस्था के बीच अत्यंत पतली रेखा होती है। राम चरित मानस में तुलसीदास ने जनसाधारण को समझाने के उद्देश्य से ही हनुमान का एक व्यक्ति के रूप में वर्णन किया है और उन्हें अपने गुरु का दर्जा दिया है।
हनु का अर्थ होता है ग्रीवा, चेहरे के नीचे वाला भाग अर्थात ठोड़ी, मान का अर्थ होता है गरिमा, बड़ाई, सम्मान। इस प्रकार हनुमान का मतलब ऐसा व्यक्ति जिसने अपने मान-सम्मान को अपनी ठोड़ी के नीचे रखा है अर्थात जीत लिया है। जिसने अपने मान-सम्मान को जीत लिया है, उसके प्रभाव से जो मुक्त हो चुका है, वही हनुमान हो सकता है। हनुमान का एक नाम बालाजी है, जिसका तात्पर्य है बालक। हमारे ग्रंथों में हनुमान जी को हमेशा बालक ही दिखलाया गया है। बालक के समान निष्कलुष हृदय वाला व्यक्ति ही सम्मान पाने की लालसा से मुक्त रह सकता है और सही अर्थों में ब्रह्माचर्य का पालन कर सकता है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार भी हनुमान जी ने कभी अपनी शक्ति व सामर्थ्य का गर्व नहीं किया। राम दरबार के चित्र में उन्होंने सबसे नीचे भूमि पर, सेवक वाली जगह पर ही हाथ जोड़े बैठे दिखाया जाता है।
ऐसे महान चरित्र को वानर के रूप में क्यों चित्रित किया गया? ऐसा प्रश्न आपके मन में भी जरूर उठता होगा। कहाँ ऐसा महान व्यक्तित्व और कहाँ वानर रूप, जो एक निकृष्ट व उद्दण्ड जानवर माना जाता है। वास्तव में वानर प्रतीक है मनुष्य के अविवेकी व चंचल मन का। हमारा मन वानर के समान ही कभी भी कहीं भी टिक कर नहीं बैठ सकता, अत्यंत ही चलायमान है। और मन का नियंत्रण अत्यंत ही दुष्कर कार्य है। हनुमान पवनपुत्र हैं अर्थात पवन से भी अधिक तेज गति से चलने वाले इस मन के वे पुत्र हैं। अब बताइए, एक तो वानर की उपमा व दूसरी पवन की- दोनों ही अत्यंत चंचल। उनको वानराधीश कहने का तात्पर्य यही है कि वे मन रूपी वानर के अधिपति हैं, स्वामी हैं। उनका अपनी चंचल इंद्रियों पर नियंत्रण है। केवल मन का स्वामी ही राम रूपी ईश्वर का सवोर्त्तम भक्त हो सकता है और धर्म के कार्यों में निष्काम भाव से भाग ले सकता है।
यहाँ राम का तात्पर्य है उस रमण करने वाले तत्व से जो कि हर जगह समान रूप से व्याप्त है। दशरथ नंदन राम तो उसे व्यक्त करने के प्रतीक मात्र हैं। याद रखें कि निष्कामता सभी महान गुणों की जननी है। हनुमान निष्काम गुण की प्रतिमूर्ति हैं, इसीलिए वे कहते हैं, 'रामकाज किए बिनु मोहि कहाँ विश्राम।' वे पूरी तरह समर्पित हैं राम के प्रति, बिना किसी प्रतिफल की आशा के। यही है निष्काम भक्ति की पराकाष्ठा।
हनुमान माता अंजना व पिता केसरी के पुत्र हैं, शास्त्रों में ऐसा ही वर्णित है। माता अंजना अर्थात आँख व पिता केसरी अर्थात सिंह के समान अभूतपूर्व साहस व अभय की भावना। मनुष्य में अच्छाई या बुराई आँख से ही प्रवेश करती है- आँखों का मतलब सिर्फ दैहिक आँखें नहीं, बल्कि मन की आँखें भी, हमारा नजरिया, दृष्टिकोण। हनुमान का जन्म विशुद्ध चिंतन व सिंह के समान अभय व्यक्तित्व द्वारा ही संभव है। डरा हुआ व्यक्ति अपनी बात पर अडिग नहीं रह सकता और भय वश कुछ भी कर सकता है। हनुमान अपने जीवनकाल में न किसी से डरे न ही अभिमान किया। इसलिए वे न कभी पराजित हुए और न ही उनकी मृत्यु हुई।
साईबाबा की दिव्यशक्ति से महातीर्थ बनी शिरडी
ॐ सांई राम~~~
साईबाबा की दिव्यशक्ति से महातीर्थ बनी शिरडी~~~
शिरडी के साईबाबा आज असंख्य लोगों के आराध्यदेव बन चुके है। उनकी कीर्ति दिन दोगुनी-रात चौगुनी बढ़ती जा रही है। यद्यपि बाबा के द्वारा नश्वर शरीर को त्यागे हुए अनेक वर्ष बीत चुके है, परंतु वे अपने भक्तों का मार्गदर्शन करने के लिए आज भी सूक्ष्म रूप से विद्यमान है। शिरडी में बाबा की समाधि से भक्तों को अपनी शंका और समस्या का समाधान मिलता है। बाबा की दिव्य शक्ति के प्रताप से शिरडी अब महातीर्थ बन गई है।
कहा जाता है कि सन् 1854 ई.में पहली बार बाबा जब शिरडी में देखे गए, तब वे लगभग सोलह वर्ष के थे। शिरडी के नाना चोपदार की वृद्ध माता ने उनका वर्णन इस प्रकार किया है- एक तरुण, स्वस्थ, फुर्तीला तथा अति सुंदर बालक सर्वप्रथम नीम के वृक्ष के नीचे समाधि में लीन दिखाई पड़ा। उसे सर्दी-गर्मी की जरा भी चिंता नहीं थी। इतनी कम उम्र में उस बालयोगी को अति कठिन तपस्या करते देखकर लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ। दिन में वह साधक किसी से भेंट नहीं करता था और रात में निर्भय होकर एकांत में घूमता था। गांव के लोग जिज्ञासावश उससे पूछते थे कि वह कौन है और उसका कहां से आगमन हुआ है? उस नवयुवक के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर लोग उसकी तरफ सहज ही आकर्षित हो जाते थे। वह सदा नीम के पेड़ के नीचे बैठा रहता था और किसी के भी घर नहीं जाता था। यद्यपि वह देखने में नवयुवक लगता था तथापि उसका आचरण महात्माओं के सदृश था। वह त्याग और वैराग्य का साक्षात् मूर्तिमान स्वरूप था।
कुछ समय शिरडी में रहकर वह तरुण योगी किसी से कुछ कहे बिना वहां से चला गया। कई वर्ष बाद चांद पाटिल की बारात के साथ वह योगी पुन: शिरडी पहुंचा। खंडोबा के मंदिर के पुजारी म्हालसापति ने उस फकीर का जब 'आओ साई' कहकर स्वागत किया, तब से उनका नाम 'साईबाबा' पड़ गया। शादी हो जाने के बाद वे चांद पाटिल की बारात के साथ वापस नहीं लौटे और सदा-सदा के लिए शिरडी में बस गये। वे कौन थे? उनका जन्म कहां हुआ था? उनके माता-पिता का नाम क्या था? ये सब प्रश्न अनुत्तरित ही है। बाबा ने अपना परिचय कभी दिया नहीं। अपने चमत्कारों से उनकी प्रसिद्धि चारों ओर फैल गई और वे कहलाने लगे 'शिरडी के साईबाबा'।
साईबाबा ने अनगिनत लोगों के कष्टों का निवारण किया। जो भी उनके पास आया, वह कभी निराश होकर नहीं लौटा। वे सबके प्रति समभाव रखते थे। उनके यहां अमीर-गरीब, ऊंच-नीच, जाति-पाति, धर्म-मजहब का कोई भेदभाव नहीं था। समाज के सभी वर्ग के लोग उनके पास आते थे। बाबा ने एक हिंदू द्वारा बनवाई गई पुरानी मसजिद को अपना ठिकाना बनाया और उसको नाम दिया 'द्वारकामाई'। बाबा नित्य भिक्षा लेने जाते थे और बड़ी सादगी के साथ रहते थे। भक्तों को उनमें सब देवताओं के दर्शन होते थे। कुछ दुष्ट लोग बाबा की ख्याति के कारण उनसे ईष्र्या-द्वेष रखते थे और उन्होंने कई षड्यंत्र भी रचे। बाबा सत्य, प्रेम, दया, करुणा की प्रतिमूर्ति थे। साईबाबा के बारे में अधिकांश जानकारी श्रीगोविंदराव रघुनाथ दाभोलकर द्वारा लिखित 'श्री साई सच्चरित्र' से मिलती है। मराठी में लिखित इस मूल ग्रंथ का कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। साईनाथ के भक्त इस ग्रंथ का पाठ अनुष्ठान के रूप में करके मनोवांछित फल प्राप्त करते है।
साईबाबा के निर्वाण के कुछ समय पूर्व एक विशेष शकुन हुआ, जो उनके महासमाधि लेने की पूर्व सूचना थी। साईबाबा के पास एक ईट थी, जिसे वे हमेशा अपने साथ रखते थे। बाबा उस पर हाथ टिकाकर बैठते थे और रात में सोते समय उस ईट को तकिये की तरह अपने सिर के नीचे रखते थे। सन् 1918 ई.के सितंबर माह में दशहरे से कुछ दिन पूर्व मसजिद की सफाई करते समय एक भक्त के हाथ से गिरकर वह ईट टूट गई। द्वारकामाई में उपस्थित भक्तगण स्तब्ध रह गए। साईबाबा ने भिक्षा से लौटकर जब उस टूटी हुई ईट को देखा तो वे मुस्कुराकर बोले- 'यह ईट मेरी जीवनसंगिनी थी। अब यह टूट गई है तो समझ लो कि मेरा समय भी पूरा हो गया।' बाबा तब से अपनी महासमाधि की तैयारी करने लगे।
नागपुर के प्रसिद्ध धनी बाबू साहिब बूटी साईबाबा के बड़े भक्त थे। उनके मन में बाबा के आराम से निवास करने हेतु शिरडी में एक अच्छा भवन बनाने की इच्छा उत्पन्न हुई। बाबा ने बूटी साहिब को स्वप्न में एक मंदिर सहित वाड़ा बनाने का आदेश दिया तो उन्होंने तत्काल उसे बनवाना शुरू कर दिया। मंदिर में द्वारकाधीश श्रीकृष्ण की प्रतिमा स्थापित करने की योजना थी।
15 अक्टूबर सन् 1918 ई. को विजयादशमी महापर्व के दिन जब बाबा ने सीमोल्लंघन करने की घोषणा की तब भी लोग समझ नहीं पाए कि वे अपने महाप्रयाण का संकेत कर रहे है। महासमाधि के पूर्व साईबाबा ने अपनी अनन्य भक्त श्रीमती लक्ष्मीबाई शिंदे को आशीर्वाद के साथ 9 सिक्के देने के पश्चात कहा- 'मुझे मसजिद में अब अच्छा नहीं लगता है, इसलिए तुम लोग मुझे बूटी के पत्थर वाड़े में ले चलो, जहां मैं आगे सुखपूर्वक रहूंगा।' बाबा ने महानिर्वाण से पूर्व अपने अनन्य भक्त शामा से भी कहा था- 'मैं द्वारकामाई और चावड़ी में रहते-रहते उकता गया हूं। मैं बूटी के वाड़े में जाऊंगा जहां ऊंचे लोग मेरी देखभाल करेगे।' विक्रम संवत् 1975 की विजयादशमी के दिन अपराह्न 2.30 बजे साईबाबा ने महासमाधि ले ली और तब बूटी साहिब द्वारा बनवाया गया वाड़ा (भवन) बन गया उनका समाधि-स्थल। मुरलीधर श्रीकृष्ण के विग्रह की जगह कालांतर में साईबाबा की मूर्ति स्थापित हुई।
महासमाधि लेने से पूर्व साईबाबा ने अपने भक्तों को यह आश्वासन दिया था कि पंचतत्वों से निर्मित उनका शरीर जब इस धरती पर नहीं रहेगा, तब उनकी समाधि भक्तों को संरक्षण प्रदान करेगी। आज तक सभी भक्तजन बाबा के इस कथन की सत्यता का निरंतर अनुभव करते चले आ रहे है। साईबाबा ने प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से अपने भक्तों को सदा अपनी उपस्थिति का बोध कराया है। उनकी समाधि अत्यन्त जागृत शक्ति-स्थल है।
साईबाबा सदा यह कहते थे- 'सबका मालिक एक'। उन्होंने साम्प्रदायिक सद्भावना का संदेश देकर सबको प्रेम के साथ मिल-जुल कर रहने को कहा। बाबा ने अपने भक्तों को श्रद्धा और सबूरी (संयम) का पाठ सिखाया। जो भी उनकी शरण में गया उसको उन्होंने अवश्य अपनाया। विजयादशमी उनकी पुण्यतिथि बनकर हमें अपनी बुराइयों (दुर्गुणों) पर विजय पाने के लिए प्रेरित करती है। नित्यलीलालीन साईबाबा आज भी सद्गुरु के रूप में भक्तों को सही राह दिखाते है और उनके कष्टों को दूर करते है। साईनाथ के उपदेशों में संसार के सी धर्मो का सार है। अध्यात्म की ऐसी महान विभूति के बारे में जितना भी लिखा जाए, कम ही होगा। उनकी यश-पताका आज चारों तरफ फहरा रही है। बाबा का 'साई' नाम मुक्ति का महामंत्र बन गया है और शिरडी महातीर्थ।
जय सांई राम~~~
साईबाबा की दिव्यशक्ति से महातीर्थ बनी शिरडी~~~
शिरडी के साईबाबा आज असंख्य लोगों के आराध्यदेव बन चुके है। उनकी कीर्ति दिन दोगुनी-रात चौगुनी बढ़ती जा रही है। यद्यपि बाबा के द्वारा नश्वर शरीर को त्यागे हुए अनेक वर्ष बीत चुके है, परंतु वे अपने भक्तों का मार्गदर्शन करने के लिए आज भी सूक्ष्म रूप से विद्यमान है। शिरडी में बाबा की समाधि से भक्तों को अपनी शंका और समस्या का समाधान मिलता है। बाबा की दिव्य शक्ति के प्रताप से शिरडी अब महातीर्थ बन गई है।
कहा जाता है कि सन् 1854 ई.में पहली बार बाबा जब शिरडी में देखे गए, तब वे लगभग सोलह वर्ष के थे। शिरडी के नाना चोपदार की वृद्ध माता ने उनका वर्णन इस प्रकार किया है- एक तरुण, स्वस्थ, फुर्तीला तथा अति सुंदर बालक सर्वप्रथम नीम के वृक्ष के नीचे समाधि में लीन दिखाई पड़ा। उसे सर्दी-गर्मी की जरा भी चिंता नहीं थी। इतनी कम उम्र में उस बालयोगी को अति कठिन तपस्या करते देखकर लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ। दिन में वह साधक किसी से भेंट नहीं करता था और रात में निर्भय होकर एकांत में घूमता था। गांव के लोग जिज्ञासावश उससे पूछते थे कि वह कौन है और उसका कहां से आगमन हुआ है? उस नवयुवक के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर लोग उसकी तरफ सहज ही आकर्षित हो जाते थे। वह सदा नीम के पेड़ के नीचे बैठा रहता था और किसी के भी घर नहीं जाता था। यद्यपि वह देखने में नवयुवक लगता था तथापि उसका आचरण महात्माओं के सदृश था। वह त्याग और वैराग्य का साक्षात् मूर्तिमान स्वरूप था।
कुछ समय शिरडी में रहकर वह तरुण योगी किसी से कुछ कहे बिना वहां से चला गया। कई वर्ष बाद चांद पाटिल की बारात के साथ वह योगी पुन: शिरडी पहुंचा। खंडोबा के मंदिर के पुजारी म्हालसापति ने उस फकीर का जब 'आओ साई' कहकर स्वागत किया, तब से उनका नाम 'साईबाबा' पड़ गया। शादी हो जाने के बाद वे चांद पाटिल की बारात के साथ वापस नहीं लौटे और सदा-सदा के लिए शिरडी में बस गये। वे कौन थे? उनका जन्म कहां हुआ था? उनके माता-पिता का नाम क्या था? ये सब प्रश्न अनुत्तरित ही है। बाबा ने अपना परिचय कभी दिया नहीं। अपने चमत्कारों से उनकी प्रसिद्धि चारों ओर फैल गई और वे कहलाने लगे 'शिरडी के साईबाबा'।
साईबाबा ने अनगिनत लोगों के कष्टों का निवारण किया। जो भी उनके पास आया, वह कभी निराश होकर नहीं लौटा। वे सबके प्रति समभाव रखते थे। उनके यहां अमीर-गरीब, ऊंच-नीच, जाति-पाति, धर्म-मजहब का कोई भेदभाव नहीं था। समाज के सभी वर्ग के लोग उनके पास आते थे। बाबा ने एक हिंदू द्वारा बनवाई गई पुरानी मसजिद को अपना ठिकाना बनाया और उसको नाम दिया 'द्वारकामाई'। बाबा नित्य भिक्षा लेने जाते थे और बड़ी सादगी के साथ रहते थे। भक्तों को उनमें सब देवताओं के दर्शन होते थे। कुछ दुष्ट लोग बाबा की ख्याति के कारण उनसे ईष्र्या-द्वेष रखते थे और उन्होंने कई षड्यंत्र भी रचे। बाबा सत्य, प्रेम, दया, करुणा की प्रतिमूर्ति थे। साईबाबा के बारे में अधिकांश जानकारी श्रीगोविंदराव रघुनाथ दाभोलकर द्वारा लिखित 'श्री साई सच्चरित्र' से मिलती है। मराठी में लिखित इस मूल ग्रंथ का कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। साईनाथ के भक्त इस ग्रंथ का पाठ अनुष्ठान के रूप में करके मनोवांछित फल प्राप्त करते है।
साईबाबा के निर्वाण के कुछ समय पूर्व एक विशेष शकुन हुआ, जो उनके महासमाधि लेने की पूर्व सूचना थी। साईबाबा के पास एक ईट थी, जिसे वे हमेशा अपने साथ रखते थे। बाबा उस पर हाथ टिकाकर बैठते थे और रात में सोते समय उस ईट को तकिये की तरह अपने सिर के नीचे रखते थे। सन् 1918 ई.के सितंबर माह में दशहरे से कुछ दिन पूर्व मसजिद की सफाई करते समय एक भक्त के हाथ से गिरकर वह ईट टूट गई। द्वारकामाई में उपस्थित भक्तगण स्तब्ध रह गए। साईबाबा ने भिक्षा से लौटकर जब उस टूटी हुई ईट को देखा तो वे मुस्कुराकर बोले- 'यह ईट मेरी जीवनसंगिनी थी। अब यह टूट गई है तो समझ लो कि मेरा समय भी पूरा हो गया।' बाबा तब से अपनी महासमाधि की तैयारी करने लगे।
नागपुर के प्रसिद्ध धनी बाबू साहिब बूटी साईबाबा के बड़े भक्त थे। उनके मन में बाबा के आराम से निवास करने हेतु शिरडी में एक अच्छा भवन बनाने की इच्छा उत्पन्न हुई। बाबा ने बूटी साहिब को स्वप्न में एक मंदिर सहित वाड़ा बनाने का आदेश दिया तो उन्होंने तत्काल उसे बनवाना शुरू कर दिया। मंदिर में द्वारकाधीश श्रीकृष्ण की प्रतिमा स्थापित करने की योजना थी।
15 अक्टूबर सन् 1918 ई. को विजयादशमी महापर्व के दिन जब बाबा ने सीमोल्लंघन करने की घोषणा की तब भी लोग समझ नहीं पाए कि वे अपने महाप्रयाण का संकेत कर रहे है। महासमाधि के पूर्व साईबाबा ने अपनी अनन्य भक्त श्रीमती लक्ष्मीबाई शिंदे को आशीर्वाद के साथ 9 सिक्के देने के पश्चात कहा- 'मुझे मसजिद में अब अच्छा नहीं लगता है, इसलिए तुम लोग मुझे बूटी के पत्थर वाड़े में ले चलो, जहां मैं आगे सुखपूर्वक रहूंगा।' बाबा ने महानिर्वाण से पूर्व अपने अनन्य भक्त शामा से भी कहा था- 'मैं द्वारकामाई और चावड़ी में रहते-रहते उकता गया हूं। मैं बूटी के वाड़े में जाऊंगा जहां ऊंचे लोग मेरी देखभाल करेगे।' विक्रम संवत् 1975 की विजयादशमी के दिन अपराह्न 2.30 बजे साईबाबा ने महासमाधि ले ली और तब बूटी साहिब द्वारा बनवाया गया वाड़ा (भवन) बन गया उनका समाधि-स्थल। मुरलीधर श्रीकृष्ण के विग्रह की जगह कालांतर में साईबाबा की मूर्ति स्थापित हुई।
महासमाधि लेने से पूर्व साईबाबा ने अपने भक्तों को यह आश्वासन दिया था कि पंचतत्वों से निर्मित उनका शरीर जब इस धरती पर नहीं रहेगा, तब उनकी समाधि भक्तों को संरक्षण प्रदान करेगी। आज तक सभी भक्तजन बाबा के इस कथन की सत्यता का निरंतर अनुभव करते चले आ रहे है। साईबाबा ने प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से अपने भक्तों को सदा अपनी उपस्थिति का बोध कराया है। उनकी समाधि अत्यन्त जागृत शक्ति-स्थल है।
साईबाबा सदा यह कहते थे- 'सबका मालिक एक'। उन्होंने साम्प्रदायिक सद्भावना का संदेश देकर सबको प्रेम के साथ मिल-जुल कर रहने को कहा। बाबा ने अपने भक्तों को श्रद्धा और सबूरी (संयम) का पाठ सिखाया। जो भी उनकी शरण में गया उसको उन्होंने अवश्य अपनाया। विजयादशमी उनकी पुण्यतिथि बनकर हमें अपनी बुराइयों (दुर्गुणों) पर विजय पाने के लिए प्रेरित करती है। नित्यलीलालीन साईबाबा आज भी सद्गुरु के रूप में भक्तों को सही राह दिखाते है और उनके कष्टों को दूर करते है। साईनाथ के उपदेशों में संसार के सी धर्मो का सार है। अध्यात्म की ऐसी महान विभूति के बारे में जितना भी लिखा जाए, कम ही होगा। उनकी यश-पताका आज चारों तरफ फहरा रही है। बाबा का 'साई' नाम मुक्ति का महामंत्र बन गया है और शिरडी महातीर्थ।
जय सांई राम~~~
कुत्ते की पूँछ - पंडितजी व लक्ष्मण (बदमाश)
पंडितजी चुपचाप बैठे अपने भविष्य के विषय में चिंतन कर रहे थे
उन्हें पता ही नहीं चला कि कब एक आदमी उनके पास आकर खड़ा हो गया है
जब पंडितजी ने कुछ ध्यान न दिया तो, उसने स्वयं आवाज दी
"राम-राम पंडितजी
"
पंडितजी चौंक गये
"क्या बात है, किस सोच में पड़े हो ?"
पंडितजी ने देखा तो देखते ही रह गये
उनके सामने लक्ष्मण खड़ा था
"लक्ष्मण...तुम...
"
"हां पंडितजी
"
"कब आये ?" -पूछा पंडितजी ने
"बस सीधे आपके पास ही चला आ रहा हूं
" लक्ष्मण पंडितजी के पास बैठ गया
पंडितजी अभी भी उसे एकटक देखे जा रहे थे
कोई दो साल के बाद लक्ष्मण को देखा था
लक्ष्मण शिरडी का मशहूर बदमाश था
दो साल की सजा भुगतने के बाद अब वह जेल से सीधा आ रहा था
लक्ष्मण का इस दुनिया में कोई न था
वह एकदम अकेला था
आवारागर्दी, चोरी, गुंडागर्दी, छेड़छाड़, मारपीट करना ही उसके काम थे
लक्ष्मण बोला - "क्या बात है, बड़े चुपचाप और उदास से बैठे हैं आज आप ?"
"हां
" - पंडितजी ने एक गहरी सांस छोड़ते हुए कहा
"क्या बात हो गयी ?"
"कुछ न पूछ लक्ष्मण ! इस गांव में एक चमत्कारी बाबा आया है
उसने मेरा सारा धंधा-पानी ही चौपट कर दिया है
अब तो भूखों मरने की नौबत आ गयी है
"
लक्ष्मण आश्चर्य से बोला - "कौन है वह ?"
"लोग उसको साईं बाबा कहते हैं
"
"अच्छा कहां का है वह ?"
"क्या पता ?" पंडितजी ने कहा - "तुम अपना हालचाल कहो
"
"बस ! सीधा जेल से छूटते ही यहां चला आ रहा हूं
" लक्ष्मण मुस्कराया - "यदि तुम कहो तो बाबा को अपना चमत्कार दिखा दूं
" और वह हँसने लगा
वैसे इससे पहले कई बार लक्ष्मण की सहायता से पंडित अपने विरोधियों को धूल चटवा चुका था
वह सोचने लगा, सांप की उस चमत्कारी घटना के कारण, जो स्वयं उसके साथ घटित हुई थी, वह भुला न पा रहा था
"बोलो पंडितजी ! क्या विचार है ?"
"कोशिश कर लो !"
"कोशिश क्यों ? मैं करके दिखा दूंगा
एक ही दिन में छोड़कर भाग जाएगा
" लक्ष्मण हँसने लगा
"जैसी तुम्हारी इच्छा
"
"क्या मैं तुम्हारे लिए इतना छोटा-सा काम नहीं कर सकता हूं ?" लक्ष्मण ने कहा - "आपके तो बहुत अहसमान हैं मुझ पर
"
"पंडित चुप रह गया
"
"कहां रहता है वह चमत्कारी बाबा ?"
"द्वारिकामाई मस्जिद में
"
"क्या पता, कभी वह मुसलमान बन जाता है और कभी हिन्दू ! क्या है वह, कुछ पता नहीं
"
"ठीक है, मैं देख लूंगा उसे
"
"जरा सावधानी से
" पंडित बोला - "सुना है, बड़ा चमत्कारी है वह
"
"अच्छा-अच्छा
" लक्ष्मण बोला - "ख्याल रखूंगा
"
"ठीक है सुबह-शाम मेरे यहां आकर खाना खा गया जाया करो
रात मैं बरामदा सोने के लिए है ही
"
लक्ष्मण चला गया
पंडित चिंता में पड़ गया
कहीं फिर उसने आत्मघाती कदम तो नहीं उठा लिया
यदि चमत्कार हो गया तो इस बार साईं बाबा उसे माफ नहीं करेगा
वह परेशान था कि आखिर यह साईं है क्या ?
लक्ष्मण पंडित के पास से उठकर सीधे द्वारिकामाई मस्जिद गया
टूटी-फूटी द्वारिका मस्जिद का कायाकल्प देखकर वह हैरान रह गया
मस्जिद में चहल-पहल थी
साईं बाबा की धूनी जली हुई थी
वह उनकी धूनी के पास जाकर बैठ गया
साईं बाबा के पास उनके शिष्य बैठे थे
लक्ष्मण ने देखा, साईं बाबा कोई विशेष नहीं है
दुबला-पतला, इकहरा बदन है
एक ही हाथ में जमीन सूंघ जाएगा
हां, चेहरे पर एक अजीब-सा आकर्षक-तेज अवश्य था
"
साईं बाबा ने लक्ष्मण की ओर नजर उठाकर भी न देखा
अजनबी होने के बावजूद उससे पूछताछ न की
शिष्यगण चले गए
लक्ष्मण अकेला बैठा रह गया
उसकी उपस्थिति की सर्वथा उपेक्षा कर साईं बाबा आँखें मूंदकर लेट गए
मौका अच्छा जानकर, लक्ष्मण बाबा को धमकी देने के बारे में विचार कर रहा था
इससे पहले कि वह कुछ बोलता, साईं बाबा ने स्वयं कहा -
"मैं जानता हूं कि तू मुझे मारने आया है
"
यह बात सुनते ही लक्ष्मण बुरी तरह से चौंक गया
वह बुरी तरह घबरा गया
"मार, मार दे मुझे और अपनी इच्छा पूरी कर ले
"
साईं बाबा का चेहरा बुरी तरह से तमतमा गया
लक्ष्मण को काटो तो खून न था
वह काठ के समान जड़ होकर रह गया
साईं बाबा का रौद्र रूप देखकर वह घबरा गया
उसका शरीर पसीने से तर-ब-तर हो गया
"कोई हथियार लाया है या खाली हाथ आया है?" - साईं बाबा बोले
वह घबरा गया
"बोल, जवाब दे
"
लक्ष्मण पसीने-पसीने हो गया
वह घबराकर साईं बाबा के चरणों पर गिर गया और गिड़गिड़ाने लगा - "क्षमा कर दो बाबा
क्षमा कर दो
"
"मेरे पैर छोड़
"
"जब तक आप मुझे क्षमा नहीं करेंगे, तब तक मैं आपके पैर नहीं छोड़ूंगा
आप तो अंतर्यामी हैं
मैं आपकी महिमा को न जान सका
"
"जा माफ किया
नेक आदमी बन
"
लक्ष्मण चुपचाप सिर झुकाकर चला गया
तब साईं बाबा खिलखिलाकर हँस पड़े
एकदम बच्चों के समान थी उनकी हँसी
यह अंदाजा लगाना मुश्किल था कि कुछ समय पूर्व उनका रूप बेहद रौद्र हो गया था
साईं बाबा के पास उनका एक शिष्य आया, तो वह बड़बड़ा रहे थे - "कुत्ते की पूँछ क्या भला कभी सीधी हो सकती है ?"
शिष्य इस बात को समझ न पाया
लक्ष्मण ने पंडित के पास जाकर हाथ जोड़कर सारा किस्सा बताया, तो पंडित का मन ग्लानी, पश्चात्ताप से भर गया
वह साईं बाबा को मान गया
उसने साईं बाबा का विरोध करना बंद कर दिया और उनका परमभक्त बन गया
उन्हें पता ही नहीं चला कि कब एक आदमी उनके पास आकर खड़ा हो गया है
जब पंडितजी ने कुछ ध्यान न दिया तो, उसने स्वयं आवाज दी
"राम-राम पंडितजी
"
पंडितजी चौंक गये
"क्या बात है, किस सोच में पड़े हो ?"
पंडितजी ने देखा तो देखते ही रह गये
उनके सामने लक्ष्मण खड़ा था
"लक्ष्मण...तुम...
"
"हां पंडितजी
"
"कब आये ?" -पूछा पंडितजी ने
"बस सीधे आपके पास ही चला आ रहा हूं
" लक्ष्मण पंडितजी के पास बैठ गया
पंडितजी अभी भी उसे एकटक देखे जा रहे थे
कोई दो साल के बाद लक्ष्मण को देखा था
लक्ष्मण शिरडी का मशहूर बदमाश था
दो साल की सजा भुगतने के बाद अब वह जेल से सीधा आ रहा था
लक्ष्मण का इस दुनिया में कोई न था
वह एकदम अकेला था
आवारागर्दी, चोरी, गुंडागर्दी, छेड़छाड़, मारपीट करना ही उसके काम थे
लक्ष्मण बोला - "क्या बात है, बड़े चुपचाप और उदास से बैठे हैं आज आप ?"
"हां
" - पंडितजी ने एक गहरी सांस छोड़ते हुए कहा
"क्या बात हो गयी ?"
"कुछ न पूछ लक्ष्मण ! इस गांव में एक चमत्कारी बाबा आया है
उसने मेरा सारा धंधा-पानी ही चौपट कर दिया है
अब तो भूखों मरने की नौबत आ गयी है
"
लक्ष्मण आश्चर्य से बोला - "कौन है वह ?"
"लोग उसको साईं बाबा कहते हैं
"
"अच्छा कहां का है वह ?"
"क्या पता ?" पंडितजी ने कहा - "तुम अपना हालचाल कहो
"
"बस ! सीधा जेल से छूटते ही यहां चला आ रहा हूं
" लक्ष्मण मुस्कराया - "यदि तुम कहो तो बाबा को अपना चमत्कार दिखा दूं
" और वह हँसने लगा
वैसे इससे पहले कई बार लक्ष्मण की सहायता से पंडित अपने विरोधियों को धूल चटवा चुका था
वह सोचने लगा, सांप की उस चमत्कारी घटना के कारण, जो स्वयं उसके साथ घटित हुई थी, वह भुला न पा रहा था
"बोलो पंडितजी ! क्या विचार है ?"
"कोशिश कर लो !"
"कोशिश क्यों ? मैं करके दिखा दूंगा
एक ही दिन में छोड़कर भाग जाएगा
" लक्ष्मण हँसने लगा
"जैसी तुम्हारी इच्छा
"
"क्या मैं तुम्हारे लिए इतना छोटा-सा काम नहीं कर सकता हूं ?" लक्ष्मण ने कहा - "आपके तो बहुत अहसमान हैं मुझ पर
"
"पंडित चुप रह गया
"
"कहां रहता है वह चमत्कारी बाबा ?"
"द्वारिकामाई मस्जिद में
"
"क्या पता, कभी वह मुसलमान बन जाता है और कभी हिन्दू ! क्या है वह, कुछ पता नहीं
"
"ठीक है, मैं देख लूंगा उसे
"
"जरा सावधानी से
" पंडित बोला - "सुना है, बड़ा चमत्कारी है वह
"
"अच्छा-अच्छा
" लक्ष्मण बोला - "ख्याल रखूंगा
"
"ठीक है सुबह-शाम मेरे यहां आकर खाना खा गया जाया करो
रात मैं बरामदा सोने के लिए है ही
"
लक्ष्मण चला गया
पंडित चिंता में पड़ गया
कहीं फिर उसने आत्मघाती कदम तो नहीं उठा लिया
यदि चमत्कार हो गया तो इस बार साईं बाबा उसे माफ नहीं करेगा
वह परेशान था कि आखिर यह साईं है क्या ?
लक्ष्मण पंडित के पास से उठकर सीधे द्वारिकामाई मस्जिद गया
टूटी-फूटी द्वारिका मस्जिद का कायाकल्प देखकर वह हैरान रह गया
मस्जिद में चहल-पहल थी
साईं बाबा की धूनी जली हुई थी
वह उनकी धूनी के पास जाकर बैठ गया
साईं बाबा के पास उनके शिष्य बैठे थे
लक्ष्मण ने देखा, साईं बाबा कोई विशेष नहीं है
दुबला-पतला, इकहरा बदन है
एक ही हाथ में जमीन सूंघ जाएगा
हां, चेहरे पर एक अजीब-सा आकर्षक-तेज अवश्य था
"
साईं बाबा ने लक्ष्मण की ओर नजर उठाकर भी न देखा
अजनबी होने के बावजूद उससे पूछताछ न की
शिष्यगण चले गए
लक्ष्मण अकेला बैठा रह गया
उसकी उपस्थिति की सर्वथा उपेक्षा कर साईं बाबा आँखें मूंदकर लेट गए
मौका अच्छा जानकर, लक्ष्मण बाबा को धमकी देने के बारे में विचार कर रहा था
इससे पहले कि वह कुछ बोलता, साईं बाबा ने स्वयं कहा -
"मैं जानता हूं कि तू मुझे मारने आया है
"
यह बात सुनते ही लक्ष्मण बुरी तरह से चौंक गया
वह बुरी तरह घबरा गया
"मार, मार दे मुझे और अपनी इच्छा पूरी कर ले
"
साईं बाबा का चेहरा बुरी तरह से तमतमा गया
लक्ष्मण को काटो तो खून न था
वह काठ के समान जड़ होकर रह गया
साईं बाबा का रौद्र रूप देखकर वह घबरा गया
उसका शरीर पसीने से तर-ब-तर हो गया
"कोई हथियार लाया है या खाली हाथ आया है?" - साईं बाबा बोले
वह घबरा गया
"बोल, जवाब दे
"
लक्ष्मण पसीने-पसीने हो गया
वह घबराकर साईं बाबा के चरणों पर गिर गया और गिड़गिड़ाने लगा - "क्षमा कर दो बाबा
क्षमा कर दो
"
"मेरे पैर छोड़
"
"जब तक आप मुझे क्षमा नहीं करेंगे, तब तक मैं आपके पैर नहीं छोड़ूंगा
आप तो अंतर्यामी हैं
मैं आपकी महिमा को न जान सका
"
"जा माफ किया
नेक आदमी बन
"
लक्ष्मण चुपचाप सिर झुकाकर चला गया
तब साईं बाबा खिलखिलाकर हँस पड़े
एकदम बच्चों के समान थी उनकी हँसी
यह अंदाजा लगाना मुश्किल था कि कुछ समय पूर्व उनका रूप बेहद रौद्र हो गया था
साईं बाबा के पास उनका एक शिष्य आया, तो वह बड़बड़ा रहे थे - "कुत्ते की पूँछ क्या भला कभी सीधी हो सकती है ?"
शिष्य इस बात को समझ न पाया
लक्ष्मण ने पंडित के पास जाकर हाथ जोड़कर सारा किस्सा बताया, तो पंडित का मन ग्लानी, पश्चात्ताप से भर गया
वह साईं बाबा को मान गया
उसने साईं बाबा का विरोध करना बंद कर दिया और उनका परमभक्त बन गया
गुरुभिक्षा
छत्रपति शिवाजी के गुरुदेव, समर्थ गुरु रामदास एक दिन गुरुभिक्षा लेने जा रहे थे। उन पर शिवाजी की नजर पड़ी!मेरेगुरु और भिक्षा!मैं नहीं देख सकता!प्रणाम किया! बोले-"हे गुरदेव!मैं अपना पूरा राज पाठ आपके कटोरे में दाल रहा हूँ !..अब से मेरा राज्य आपका हुआ!"तब गुरु रामदास ने कहा-"सच्चे मन से दे रहे हो! वापस लेने की इच्छा तो नहीं?"
"बिलकुल नहीं !यह सारा राज्य आपका हुआ!"
"तो ठीक है! यह लो...!"कहते कहते गुरु ने अपना चोला फाड़ दिया! उसमे से एक टुकडा निकाला!भगवे रंग का कपडा था वह !इस कपडे को शिवाजी के मुकुट पर बाँध दिया और कहा -"लो!! मैं अपना राज्य तुम्हे सौंपता हूँ-चलाने के लिए!देखभाल के लिए!""मेरे नाम पर राज्य करो! मेरी धरोहर समझ कर! मेरी अमानत रहेगी तुम्हारे पास !"
"गुरदेव ! आप तो लौटा रहें है मेरी भेंट!" कहते कहते शिवाजी की ऑंखें गीली हो गयी!
"ऐसा नहीं!कहा न मेरी अमानत है!मेरे नाम पर राज्य करो! इसे धरम राज्य बनाए रखना, यही मेरी इच्छा है!"
"ठीक है गुरुदेव! इस राज्य का झंडा सदा भगवे रंग का रहेगा! इसे देखकर आपकी तथा आपकी आदर्शों की याद आती रहेगी!"
"सदा सुखी रहो ! कहकर गुरु रामदास भिक्षा हेतु चले दिए!
"बिलकुल नहीं !यह सारा राज्य आपका हुआ!"
"तो ठीक है! यह लो...!"कहते कहते गुरु ने अपना चोला फाड़ दिया! उसमे से एक टुकडा निकाला!भगवे रंग का कपडा था वह !इस कपडे को शिवाजी के मुकुट पर बाँध दिया और कहा -"लो!! मैं अपना राज्य तुम्हे सौंपता हूँ-चलाने के लिए!देखभाल के लिए!""मेरे नाम पर राज्य करो! मेरी धरोहर समझ कर! मेरी अमानत रहेगी तुम्हारे पास !"
"गुरदेव ! आप तो लौटा रहें है मेरी भेंट!" कहते कहते शिवाजी की ऑंखें गीली हो गयी!
"ऐसा नहीं!कहा न मेरी अमानत है!मेरे नाम पर राज्य करो! इसे धरम राज्य बनाए रखना, यही मेरी इच्छा है!"
"ठीक है गुरुदेव! इस राज्य का झंडा सदा भगवे रंग का रहेगा! इसे देखकर आपकी तथा आपकी आदर्शों की याद आती रहेगी!"
"सदा सुखी रहो ! कहकर गुरु रामदास भिक्षा हेतु चले दिए!
एक पत्र बाबा को
एक पत्र बाबा को
शिर्डी
दिनक : 21/ 01/2011
आदरणीय साईंबाबा जी
कैसे है आप . आप की कृपा से हम कुशल मंगल है . आज दिल करा आपको पत्र लिखने का . बाबा आपका मेरे जीवन में आना मेरी खुशनसीबी है . आप मेरे जीवन का वो अनमोल रतन हो जिसे में अपनी आँखों में और दिल में छुपा कर रखना चाहती हूँ . आपकी महानता , प्यार और विश्वास मेरी आत्मा में बसते है . आप मेरा स्वाभिमान हो . आपकी करूणा , दया , आशीर्वाद , संतोष , सबर मेरे जीवन का धन है . आपने अपने चरण कमलो में जगा देकर मेरा जीवन तार - तार कर दिया . आपकी द्रिस्टी मेरे मन को छु जाती है . आपका ममता भरा आचल मेरे जीवन की तीखी धूप को ठंडी छाव देता है . श्रद्धा और सबुरी का पाठ मुझे सही राह दिखाता है . साईंसत्चरित्र की लीलाए आपके होने का अहसास दिलाती है . कहते है भगवान को पाना आसान नहीं पर मेरा बाबा तो इतना कोमल और नरम है मेरी एक ही आवाज़ से दोड़े चले आते है . बाबा मुझे हमेशा अपनी छतरछाया में रखना . मुझे इस संसार
रुपी जाल से बचाकर रखना . हमेशा अपने आशीर्वाद की चादर मुझ पर मेरे परिवार पर और समर्पण परिवार पर बनाके रखना .
आपके चरणों में मेरा कोटि कोटि प्रणाम .
बोलो सच्चीनानन्द सत्गुरू साईंनाथ महाराज की जय !!!
आपकी भक्त
शिर्डी
दिनक : 21/ 01/2011
आदरणीय साईंबाबा जी
कैसे है आप . आप की कृपा से हम कुशल मंगल है . आज दिल करा आपको पत्र लिखने का . बाबा आपका मेरे जीवन में आना मेरी खुशनसीबी है . आप मेरे जीवन का वो अनमोल रतन हो जिसे में अपनी आँखों में और दिल में छुपा कर रखना चाहती हूँ . आपकी महानता , प्यार और विश्वास मेरी आत्मा में बसते है . आप मेरा स्वाभिमान हो . आपकी करूणा , दया , आशीर्वाद , संतोष , सबर मेरे जीवन का धन है . आपने अपने चरण कमलो में जगा देकर मेरा जीवन तार - तार कर दिया . आपकी द्रिस्टी मेरे मन को छु जाती है . आपका ममता भरा आचल मेरे जीवन की तीखी धूप को ठंडी छाव देता है . श्रद्धा और सबुरी का पाठ मुझे सही राह दिखाता है . साईंसत्चरित्र की लीलाए आपके होने का अहसास दिलाती है . कहते है भगवान को पाना आसान नहीं पर मेरा बाबा तो इतना कोमल और नरम है मेरी एक ही आवाज़ से दोड़े चले आते है . बाबा मुझे हमेशा अपनी छतरछाया में रखना . मुझे इस संसार
रुपी जाल से बचाकर रखना . हमेशा अपने आशीर्वाद की चादर मुझ पर मेरे परिवार पर और समर्पण परिवार पर बनाके रखना .
आपके चरणों में मेरा कोटि कोटि प्रणाम .
बोलो सच्चीनानन्द सत्गुरू साईंनाथ महाराज की जय !!!
आपकी भक्त
आत्मा की एकता
आत्मा की एकता
वैदिक धर्म में आत्मा की एकता पर सबसे अधिक जोर दिया गया है। जो आदमी इस तत्व को समझ लेगा, वह किससे प्रेम नहीं करेगा? जो आदमी यह समझ जाएगा कि 'घट-घट में तोरा साँई रमत है!' वह किस पर नाराज होगा? किसे मारेगा? किसे पीटेगा? किसे सताएगा? किसे गाली देगा? किसके साथ बुरा व्यवहार करेगा?
यस्मिन्सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद्विजानतः ।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥
जो आदमी सब प्राणियों में एक ही आत्मा को देखता है, उसके लिए किसका मोह, किसका शोक?
वैदिक धर्म का मूल तत्व यही है। इस सारे जगत में ईश्वर ही सर्वत्र व्याप्त है। उसी को पाने के लिए, उसी को समझने के लिए हमें मनुष्य का यह जीवन मिला है। उसे पाने का जो रास्ता है, उसका नाम है धर्म।
वैदिक धर्म में आत्मा की एकता पर सबसे अधिक जोर दिया गया है। जो आदमी इस तत्व को समझ लेगा, वह किससे प्रेम नहीं करेगा? जो आदमी यह समझ जाएगा कि 'घट-घट में तोरा साँई रमत है!' वह किस पर नाराज होगा? किसे मारेगा? किसे पीटेगा? किसे सताएगा? किसे गाली देगा? किसके साथ बुरा व्यवहार करेगा?
यस्मिन्सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद्विजानतः ।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥
जो आदमी सब प्राणियों में एक ही आत्मा को देखता है, उसके लिए किसका मोह, किसका शोक?
वैदिक धर्म का मूल तत्व यही है। इस सारे जगत में ईश्वर ही सर्वत्र व्याप्त है। उसी को पाने के लिए, उसी को समझने के लिए हमें मनुष्य का यह जीवन मिला है। उसे पाने का जो रास्ता है, उसका नाम है धर्म।
ॐनम:शिवाय
ॐनम:शिवाय मंत्र का पहला अक्षर है बीजमंत्र, जिसमें तीन अक्षरों का योग है-अ, उऔर म।इन अक्षरों के स्पंदन से बनता है ॐ।यह स्पंदन ही उस अलौकिक शक्ति की पहचान है, जो हमारे भीतर आत्मबल का संचार करती है। यही स्पंदन हमारे भीतर की कुप्रवृत्तियोंको नष्ट कर हमें कल्याण के मार्ग पर आगे बढने को प्रवृत्त करता है। शिव ही नहीं जितने भी देवताओं और देवियों की परिकल्पना की गई है, सभी ऐसे ही स्पंदनों पर आधारित हैं। वास्तव में सभी देवी-देवताओं का संयुक्त स्वरूप एक ही परम ब्रह्म है, जो इस स्पंदन से प्रभावित होता है। मंत्रों का स्पंदन विभिन्न दिशाओं की ओर उत्सर्जितहोता है। वैसे ही एक-एक स्पंदन का मूल है यह बीज मंत्र। मंत्र वैसा ही स्पंदन पैदा करते हैं, जो बोलनेवालाचाहता है। यानी कोई भक्त जब विद्या की अधिष्ठात्री सरस्वती की उपासना करता है और मंत्र बोलता है तो उससे वायुमंडल में उत्पन्न होनेवालास्पंदन शक्ति के उसी स्वरूप को आकर्षित करता है और उसके चित्त में वही शक्ति आभासित हो उठती है। भारत के महर्षियोंने लंबे समय तक घोर तपस्या करके मंत्रों का दर्शन किया है, जिससे देवी-देवताओं तक पहुंचा जा सकता है। वैसे ही मंत्रों को वेदों में संकलित किया गया है। उन महर्षियोंने भगवान शिव के स्वरूप को अच्छी तरह पहचान लिया था। उन्होंने जान लिया था कि भगवान शिव वास्तव में तो निर्गुण निराकार हैं, लेकिन उनकी उपासना आम श्रद्धालु भक्त गण कैसे कर पाएंगे। इसलिए उन्होंने भगवान शिव को सगुण साकार रूप में देखा और संसारवासियोंको बताया। यहीं से प्रतिमाओं की कल्पना होती है। प्रतिमा शब्द का अर्थ होता है प्रतिरूप। यानी ठीक वैसा ही, जैसा स्वयं भगवान शिव हैं। हालांकि शिव का दूसरा प्रतिमानहो ही नहीं सकता, लेकिन उपासना की सुगमता को ध्यान में रखकर उनकी प्रतिमा की परिकल्पना कर ली गई है। उस दृष्टिकोण से भगवान शिव सगुण साकार रूप में अनेक विग्रहोंके स्वामी हैं, लेकिन उनके विग्रहोंमें शिवलिंगका सर्वाधिक महत्व बताया जाता है। उनकी पूजा अर्चना करना अत्यंत लाभप्रद माना जाता है, लेकिन सर्वोपरि होता है मंत्र, जिसे बोल कर अर्चना की जाती है। उस मंत्र के समुचित प्रयोग के बिना अर्चना का अर्थ ही व्यर्थ हो जाता है।
माँ का महत्व
माँ का महत्व
१ आसमान ने कहा ....माँ एक इन्द्रधनुष है ,जिसमें सभी रंग समाये हुए हैं
२ शायर ने कहा ....माँ एक ऐसी गजल है जो सबके दिल में उतरती चली जाती है
३ माली ने कहा ....माँ एक दिलकश फूल है जो पूरे गुलशन को मह्काता है
४ औलाद ने कहा ....माँ ममता का अनमोल खजाना है जो हर दिल पर कुर्बान है
५ वाल्मीकि जी ने कहा ....माता और मातर भूमि का स्थान स्वर्ग से भी ऊँचा है
६ वेद व्यास जी ने कहा ....माता के समान कोई गुरु नही है
७ पैगम्बर मोहम्मद साहब ने कहा....माँ वह हस्ती है जिसके क़दमों के नीचे जन्नत है
१ आसमान ने कहा ....माँ एक इन्द्रधनुष है ,जिसमें सभी रंग समाये हुए हैं
२ शायर ने कहा ....माँ एक ऐसी गजल है जो सबके दिल में उतरती चली जाती है
३ माली ने कहा ....माँ एक दिलकश फूल है जो पूरे गुलशन को मह्काता है
४ औलाद ने कहा ....माँ ममता का अनमोल खजाना है जो हर दिल पर कुर्बान है
५ वाल्मीकि जी ने कहा ....माता और मातर भूमि का स्थान स्वर्ग से भी ऊँचा है
६ वेद व्यास जी ने कहा ....माता के समान कोई गुरु नही है
७ पैगम्बर मोहम्मद साहब ने कहा....माँ वह हस्ती है जिसके क़दमों के नीचे जन्नत है
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